Sunday, January 17, 2016

कौन सी बात कहाँ कैसे कही जाती है

ब्लॉगर :महेश  जाँगिड़ 


कौन सी बात कहाँ कैसे कही जाती है
ये सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है

एक बिगड़ी हुई औलाद भला क्या जाने
कैसे माँ बाप के होंठों से हंसी जाती है

कतरा अब एह्तिजाज़ करे भी तो क्या मिले
दरिया जो लग रहे थे समंदर से जा मिले

हर शख्स दौड़ता है यहाँ भीड़ की तरफ
फिर ये भी चाहता है उसे रास्ता मिले

इस दौर-ए-मुन्साफी में जरुरी नहीं वसीम
जिस शख्स की खता हो उसी को सजा मिले


-वसीम बरेलवी

कश्ती तेरा नसीब चमकदार कर दिया

ब्लॉगर :महेश  जाँगिड़ 



कश्ती तेरा नसीब चमकदार कर दिया

इस पार के थपेड़ों ने उस पार कर दिया


अफवाह थी की मेरी तबियत ख़राब हैं

लोगो ने पूछ पूछ के बीमार कर दिया


रातों को चांदनी के भरोसें ना छोड़ना

सूरज ने जुगनुओं को ख़बरदार कर दिया


रुक रुक के लोग देख रहे है मेरी तरफ

तुमने ज़रा सी बात को अखबार कर दिया


इस बार एक और भी दीवार गिर गयी

बारिश ने मेरे घर को हवादार कर दिया


बोल था सच तो ज़हर पिलाया गया मुझे

अच्छाइयों ने मुझे गुनहगार कर दिया


दो गज सही ये मेरी मिलकियत तो हैं

ऐ मौत तूने मुझे ज़मीदार कर दिया



-राहत इन्दौरी

रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं

ब्लॉगर :महेश  जाँगिड़

रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं

चाँद पागल हैं अंधेरे में निकल पड़ता हैं

मैं समंदर हूँ कुल्हाड़ी से नहीं कट सकता
कोई फव्वारा नही हूँ जो उबल पड़ता हैं

कल वहाँ चाँद उगा करते थे हर आहट पर
अपने रास्ते में जो वीरान महल पड़ता हैं

ना त-आरूफ़ ना त-अल्लुक हैं  मगर दिल अक्सर
नाम सुनता हैं  तुम्हारा तो उछल पड़ता हैं

उसकी याद आई हैं  साँसों ज़रा धीरे चलो
धड़कनो से भी इबादत में खलल पड़ता हैं


-राहत इन्दौरी 

दोस्ती जब किसी से की जाये

ब्लॉगर :महेश  जाँगिड़ 




दोस्ती जब किसी से की जाये

दुश्मनों की भी राय ली जाए


मौत का ज़हर हैं फिजाओं में

अब कहाँ जा के सांस ली जाए


बस इसी सोच में हूँ डूबा हुआ

ये नदी कैसे पार की जाए


मेरे माँझी  के ज़ख्म भरने लगे

आज फिर कोई भूल की जाए


बोतलें खोल के तो पी बरसों

आज दिल खोल के पी जाए

-राहत इन्दौरी

सफ़र की हद है वहां तक की कुछ निशान रहे

ब्लॉगर :महेश  जाँगिड़


सफ़र की हद है वहां तक की कुछ निशान रहे
चले चलो की जहाँ तक ये आसमान  रहे

ये क्या उठाये कदम और आ गयी मंजिल
मज़ा तो तब है के पैरों में कुछ थकान रहे

वो शख्स मुझ को कोई जालसाज़ लगता हैं
तुम उसको दोस्त समझते हो फिर भी ध्यान रहे

मुझे ज़मीं की गहराइयों ने दबा लिया
मैं चाहता था मेरे सर पे आसमान रहे

अब अपने बिच मरासिम नहीं अदावत है
मगर ये बात हमारे ही दरमियाँ रहे

सितारों की फसलें उगा ना सका कोई
मेरी ज़मीं पे कितने ही आसमान रहे

वो एक सवाल है फिर उसका सामना होगा
दुआ करो की सलामत मेरी ज़बान रहे


-राहत इन्दौरी