Sunday, January 17, 2016

सामने गुलशन नज़र आया




सामने गुलशन नज़र आया

गीत भँवरे ने मधुर गाया ।


फूल के संग मिले काँटे भी

ज़िन्दगी का यही सरमाया ।


उन की महफ़िल में क़दम मेरा

मैं बडी गुस्ताखी कर आया ।


आँख में भर कर उसे देखा

फिर रहा हूँ तब से भरमाया ।


चोट ऐसी वक्त ने मारी

गीत होंठों ने मधुर गाया ।


धुंध ऐसी सुबह को छाई

शाम का मन्जर नज़र आया ।


आँख टेढ़ी जब हुई उन की

ज़िन्दगी ने बस क़हर ढाया ।


डॉ सुधेश

चाहा तुम्हें यह अब कहूँ




मैंने लिखा कुछ भी नहीं

तुम ने पढ़ा कुछ भी नहीं 



जो भी लिखा दिल से लिखा

इस के सिवा कुछ भी नहीं ।



मुझ से ज़माना है ख़फ़ा

मेरी ख़ता कुछ भी नहीं 



तुम तो खुदा के बन्दे हो

मेरा खुदा कुछ भी नहीं ।



मैं ने उस पर जान दी

उस को वफ़ा कुछ भी नहीं 



चाहा तुम्हें यह अब कहूँ

लेकिन कहा कुछ भी नहीं ।



यह तो नज़र की बात है

अच्छा बुरा कुछ भी नहीं ।

- रचनाकार: डॉ सुधेश

मिट्टी में मिला दे की जुदा हो नहीं सकता






मिट्टी में मिला दे की जुदा हो नहीं सकता

अब इससे जयादा मैं तेरा हो नहीं सकता



दहलीज़ पे रख दी हैं किसी शख़्स ने आँखें

रौशन कभी इतना तो दिया हो नहीं सकता


बस तू मेरी आवाज़ में आवाज़ मिला दे

फिर देख की इस शहर में क्या हो नहीं सकता


ऎ मौत मुझे तूने मुसीबत से निकाला

सय्याद समझता था रिहा हो नहीं सकता


इस ख़ाकबदन को कभी पहुँचा दे वहाँ भी

क्या इतना करम बादे-सबा* हो नहीं सकता


पेशानी* को सजदे भी अता कर मेरे मौला

आँखों से तो यह क़र्ज़ अदा हो नहीं सकता


*बादे-सबा – बहती हवा

*पेशानी -माथे


"मुनव्वर राना"


ज़मीं से चूमकर तितली के टूटे पर उठाते हैं




अजब दुनिया है नाशायर यहाँ पर सर उठाते हैं
जो शायर हैं वो महफ़िल में दरी- चादर उठाते हैं


तुम्हारे शहर में मय्यत को सब काँधा नहीं देते

हमारे गाँव में छप्पर भी सब मिल कर उठाते हैं


इन्हें फ़िरक़ापरस्ती मत सिखा देना कि ये बच्चे

ज़मीं से चूमकर तितली के टूटे पर उठाते हैं


समन्दर के सफ़र से वापसी का क्या भरोसा है

तो ऐ साहिल, ख़ुदा हाफ़िज़ कि हम लंगर उठाते हैं


ग़ज़ल हम तेरे आशिक़ हैं मगर इस पेट की ख़ातिर

क़लम किस पर उठाना था क़लम किसपर उठाते हैं


बुरे चेहरों की जानिब देखने की हद भी होती है

सँभलना आईनाख़ानो, कि हम पत्थर उठाते हैं


"मुनव्वर राना"


तुम्हारे जिस्म की ख़ुश्बू गुलों से आती है





तुम्हारे जिस्म की खुशबू गुलों से आती है

ख़बर तुम्हारी भी अब दूसरों से आती है


हमीं अकेले नहीं जागते हैं रातों में

उसे भी नींद बड़ी मुश्किलों से आती है


हमारी आँखों को मैला तो कर दिया है मगर

मोहब्बतों में चमक आँसुओं से आती है


इसी लिए तो अँधेरे हसीन लगते हैं

कि रात मिल के तेरे गेसुओं से आती है


ये किस मक़ाम पे पहुँचा दिया मोहब्बत ने

कि तेरी याद भी अब कोशिशों से आती है



       "मुनव्वर राना "